Saturday, November 19, 2011

Silly sadness bekar ka dukh hindi

दुख : एक कविता

दुख के आने का
दुख के जाने का
दुख के आकर न जाने का
कोई नियम न है, न था, न होगा।

नियम बनाया गया
दुख के बाद सुख आएगा
इसके पीछे क्या था
थोड़ा अनुभव
ज्यादा आशावादिता
उससे भी कहीं ज्यादा
दुखी को यह बताकर
लुभाने की लालसा
क्योंकि दुखी अक्सर
बड़े काम का भी होता है
जो सहानुभूति और दिलासा पाकर
अपना विवेक खोता है



तुम्हे क्या चाहिये बोलो
सुख या दुख
जो चाहो मिलेगा
पर सोच लो
तुम्हे ज्यादा फर्क़ नही पड़ेगा
 पूछो क्यों
दुख में हमारे अपने दूर होते हैं
सुख में हम अपनों से दूरी बनाते हैं
दुख में दुख के बढ़ने का
सुख में सुख के घटने का
डर हमेशा घेरे रहता है,
कोई दुख से पागल होता है
तो किसी का सुख से सिर फिर जाता है,
अपने सुख का पता नहीं लगता
अपना दुख बहुत नजर आता है,
दुख में आँख खुलती है
सुख में आँख पर परदा पड़ जाता है,
दुख अपना हो तो दुख
दूसरे का हो तो सुख होता है
सुख अपना हो तो सुख
दूसरों का हो तो दुख देता है।

ज्यादा दुख और ज्यादा सुख -
पेट की नजर में एक हैं
एक में खाने की सुधि नहीं
दूसरे में खाने का स्वाद नहीं
 छोटे दुखों को करो दरकिनार्
सबसे बड़े वाले की बात करो यार
बड़े से बड़ा योद्धा भी एक बात से डरता है
बड़ी समस्या है यार हर आदमी क्यों  मरता है 
पर मौत अगर बिना बुलाए 
उसे कभी भी न आए
तो  तीन सौ साल का लावारिस कहाँ जाए 
अन्तहीन बुढ़ापे का दर्द
उसी से  आत्महत्या कराए
सुना है दिमाग जिन्दा रहता है
मरने के आधे घंटे बाद तक
उस दौरान हम क्या करेंगे
मरने का शोक यानि
और जीने की आस
मगर क्यों?
आगे भी तो नया जीवन है ...............

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